जय जय हरि, दया के सागर, जग के पहले कारण
तुमसे जन्मा सारा जीवन, तुम ही सबके पालन।
अंत समय यह सारी दुनिया, तुममें ही मिल जाती
तेरे बिना इस जग में हरि, कोई राह न पाती।
यह संसार किससे बना है, किसने इसे सजाया?
आकाश, हवा, आग और पानी, किसने यहाँ बनाया?
धरती किस आधार टिकी है, सूरज कितना भारी?
इन सवालों का सच बतलाओ, हे दुनिया के स्वामी।
युग कैसे आते-जाते हैं, समय कहाँ से चलता?
किसके नियमों से यह सूरज रोज़ समय पर ढलता?
यह सारा फैला जग हरि, तेरी इच्छा का रूप
तू ही आदि, तू ही मध्य है, तू ही अंतिम स्वरूप।
जय जय हरि, दया के सागर, जग के पहले कारण
तुमसे जन्मा सारा जीवन, तुम ही सबके पालन।
अंत समय यह सारी दुनिया, तुममें ही मिल जाती
तेरे बिना इस जग में हरि, कोई राह न पाती।
जग बनने से पहले बोलो, सब कुछ कहाँ समाया?
और मिटेगा जब यह जग तो, किसमें होगा साया?
तेरी लीला का गहरा सच, कौन यहाँ जान पाया?
तेरी माया के आगे हर मन, खुद को छोटा पाया।
सागर, पर्वत, देव और ऋषि, तेरे मन से आए
तेरे सुंदर सपनों ने ही, कितने रूप बनाए।
तू ही इस संसार को रचता, तू ही इसे बचाता
समय पूरा होने पर हरि, तू ही इसे मिटाता।
मुझ पर थोड़ी दया करो प्रभु, सच्ची समझ दिलाओ
मैं भी तेरे असली रूप को, अपने मन में पाऊँ।
तेरे मुख से ज्ञान मैं सुन लूँ, यही मेरी है चाह
जन्म-मरण के दुख से निकालो, दिखला दो वह राह।
जय जय हरि, दया के सागर, जग के पहले कारण
तुमसे जन्मा सारा जीवन, तुम ही सबके पालन।
अंत समय यह सारी दुनिया, तुममें ही मिल जाती
तेरे बिना इस जग में हरि, कोई राह न पाती।
वेद और सारे धर्म के ग्रंथ, तुमसे रोशन होते
अच्छे कर्म और सच्चे जीवन, तेरी राह से होते।
धर्म का गहरा अर्थ तुम्हारी, शक्ति हमें बताती
तेरी कृपा भटके मन को, सही दिशा दिखलाती।
ज्ञान, रक्षा, व्यापार और सेवा, सबके अपने काम
जीवन के हर पड़ाव का भी, तुमने रखा नाम।
सबके नियम तुम्हीं ने रचकर, जग में मेल कराया
हर प्राणी को उसके कर्म का, सीधा मार्ग दिखाया।
हे जग के स्वामी, मेरे मन में, दया का दीप जलाओ
मन की सारी उलझन हरकर, सच्चा ज्ञान दिलाओ।
जो कुछ ज्ञानी संतों ने अपने, ध्यान में सच पाया
वही तुम्हारी महिमा बनकर, आज मेरे मन ने गाया।
तुमसे ही यह सुबह निकलती, तुमसे रात भी आती
तुमसे नदियाँ बहती रहतीं, धरती फूल खिलाती।
जीव-जगत की हर एक धड़कन, तेरे नाम से चलती
तेरी कृपा मिलने पर हरि, बंद किस्मत भी खुलती।
तू ही माता, तू ही पिता है, तू ही सच्चा साथी
अंधियारे में तेरी भक्ति, बनती उजली बाती।
बुद्धि देना, शक्ति देना, भक्ति सदा बनाए रखना
अपने चरणों की छाया में, मुझको हरि बसाए रखना।
जय जय हरि, दया के सागर, जग के पहले कारण
तुमसे जन्मा सारा जीवन, तुम ही सबके पालन।
तुम ही आदि, तुम ही अंत हो, तुम ही जग का सार
तेरे चरणों में ही मिलता, जीवन को आधार।
जय जय हरि, दया के सागर, सुन लो मेरी वाणी
तेरी महिमा गाते-गाते, बीते उम्र पुरानी।
अंत समय यह सारी दुनिया, तुममें ही मिल जाती
तेरे बिना इस जग में हरि, कोई राह न पाती।